भविष्य 3000

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PRODUCT ID- IntolegalworldTP-8523

सार

भविष्य 3000 की परिकल्पना का आधार तकनीकी व प्रौद्योगिकी के क्षेत्र मे हो रही अविश्वसनीय उन्नति है।
जब 31वीं सदी में अपराध अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाता है,तब तकनीक और मनुष्य के बुद्धि कौशल से निर्माण होता है एक ऐेसे समाजसुधारक जीव का जिसमें असीम शक्तियाँ मौजूद हैं और इसका नाम है ……….काल !
अपने निर्माण के कुछ महीनों के भीतर ही काल अपराधियों के लिए काल सिद्ध होता है परन्तु काल की इस सफलता से अन्डरवल्र्ड का बादशाह हुसैन तिलमिला उठता है। वह काल को जड़ से उखाड़ फेंकना चाहता है और अंततः अपने कुटिल षडयंत्रों में फंसाकर काल को दुनिया की नज़रों मे घातक आविष्कार सिद्ध करने में सफल हो जाता है।
अंतर्राष्ट्रीय दबाव के चलते काल को मानवों की दुनिया से दूर ’शुक्र अभियान’ पर भेज दिया जाता है। वहाँ पहँुच कर कुछ ऐसे रहस्यों से परदा उठता है जिनसे अभी तक सारी दुनिया अनजान है, वहाँ उसकी मुलाकात एक ऐसे व्यक्ति से होती है जिसे केवल पौराणिक किस्से-कहानियों में ही सुना गया है और वो व्यक्ति हैं ………दैत्यगुरू शुक्राचार्य!
यहीं से कहानी एक अत्यन्त रोमांचक मोड़ ले लेती है और निर्धारित होता है हमारा ’’भविष्य 3000’’!

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IntolegalworldTP-8523

Description

सार

भविष्य 3000 की परिकल्पना का आधार तकनीकी व प्रौद्योगिकी के क्षेत्र मे हो रही अविश्वसनीय उन्नति है।
जब 31वीं सदी में अपराध अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाता है,तब तकनीक और मनुष्य के बुद्धि कौशल से निर्माण होता है एक ऐेसे समाजसुधारक जीव का जिसमें असीम शक्तियाँ मौजूद हैं और इसका नाम है ……….काल !
अपने निर्माण के कुछ महीनों के भीतर ही काल अपराधियों के लिए काल सिद्ध होता है परन्तु काल की इस सफलता से अन्डरवल्र्ड का बादशाह हुसैन तिलमिला उठता है। वह काल को जड़ से उखाड़ फेंकना चाहता है और अंततः अपने कुटिल षडयंत्रों में फंसाकर काल को दुनिया की नज़रों मे घातक आविष्कार सिद्ध करने में सफल हो जाता है।
अंतर्राष्ट्रीय दबाव के चलते काल को मानवों की दुनिया से दूर ’शुक्र अभियान’ पर भेज दिया जाता है। वहाँ पहँुच कर कुछ ऐसे रहस्यों से परदा उठता है जिनसे अभी तक सारी दुनिया अनजान है, वहाँ उसकी मुलाकात एक ऐसे व्यक्ति से होती है जिसे केवल पौराणिक किस्से-कहानियों में ही सुना गया है और वो व्यक्ति हैं ………दैत्यगुरू शुक्राचार्य!
यहीं से कहानी एक अत्यन्त रोमांचक मोड़ ले लेती है और निर्धारित होता है हमारा ’’भविष्य 3000’’!

Author

इस उपन्यास में लेखक वर्तमान परिस्थितियों के आधार पर एक ऐसे भविष्य की कल्पना करता है जो हमारी उम्मीदों से काफी अलग और रोमांचक है। वर्तमान समय में धर्म को तर्क और विज्ञान से पृथक समझा जाता है परंतु लेखक ने अपनी पुस्तक में धर्म और विज्ञान को एक दूसरे का पूरक बताने का पूर्ण प्रयास किया है।
लेखक का मुख्य उद्देश्य पाठकों को एक ऐसा उपन्यास प्रदान करना है जिसे पढ़कर वे अपने संभावित भविष्य की कल्पना एक अलग नज़रिए से कर सकें।

First chapter

भूमिका   


 

भूमिका ’’दादाजी आज मैं इतिहास पढ़ रहा था, पढ़ाई के दौरान मैंने एक अजीब बात पर गौर किया कि आज से 2000 वर्ष पूर्व भी हम इतने ही विकसित थे जितने आज, मेरा मतलब तब और अब के समय में ज्यादा अन्तर नही दिखता अपितु प्रौद्योगिकी(टेक्नालाॅजी) के मामले में तो हम तब की अपेक्षा पिछड़ गए हैं।’’ ये बात 41वीं सदी का 10 साल का गौरव अपने दादाजी से पूछ रहा था जिसने कौतूहलवश अपने दादाजी की अलमारी से प्राचीन इतिहास की पुस्तक निकालकर पढ़नी शुरू की थी।’’बेटा शायद तुमने गौर नहीं किया तब और अब की सामाजिक दशा में बहुत फर्क है, तब लोग धर्म और जाति के नाम पर लड़ने लगते थे, पर अब समाज को उनके कार्य के आधार पर चार वर्गों में बांट दिया गया है, व्यक्ति अपने पसंद के वर्ग को चुनकर वर्ग विशेष के लिए निर्धारित कार्य करने को स्वतंत्र है जबकि तब ऐसा नहीं था, हाँ प्रौद्योगिकी(टेक्नालाॅजी) के मामले में हम 2000 वर्ष पूर्व भी कमोबेश समान स्थिति में थे।’’ दादा जी ने गौरव की जिज्ञासा शांत करते हुए ये जवाब दिया। गौरव का निवास स्थान 23/डी नवयुग काॅलोनी, सम्भलपुर मुम्बई थी, उसके दादाजी प्रो0 शांतनु सम्भलपुर की ’न्यू एरा यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्राध्यापक थे, वर्तमान में ये यूनिवर्सिटी भारत की सर्वोच्च यूनिवर्सिटी थी। गौरव की शिक्षा-दीक्षा की पूर्ण जिम्मेदारी दादा जी ने ही ले रखी थी क्योंकि गौरव के माता-पिता बचपन में ही गुजर चुके थे। आपकी बात सही है परन्तु हमने इस लंबे समयान्तराल के दौरान  प्रौद्योगिक विकास क्यों नहीं किया? गौरव के बालमन की जिज्ञासा इतनी जल्दी शांत होने वाली नहीं थी, वो अपने मन में उठने वाले हर प्रश्न का उत्तर तत्काल जानना चाहता था।प्रो0 शांतनु- बेटा ! हमने प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आज से कई गुना ज्यादा तरक्की की थी और ये अमन-चैन उसी का अप्रत्यक्ष परिणाम है।गौरव- इसका मतलब मनुष्य ने तकनीक का इस्तेमाल अमन-चैन फैलाने में किया, परन्तु ऐसी कौन-सी तकनीक का इस्तेमाल हुआ कि इतने बड़े पैमाने पर अमन चैन फैल गया और फिर वो तकनीक है किसके पास?प्रोफेसर- बेटा अभी तुमने प्राचीन इतिहास की पुस्तक के कुछ ही पृष्ठ पढ़े हैं, जब तुम आधुनिक इतिहास की पुस्तक पढ़ोगे, तब तुम्हें समझ आएगा कि तुम गलत दिशा में सोच रहे हो।गौरव- तो क्या मैं सीधे आधुनिक इतिहास की पुस्तक पढ़ लूँ?प्रोफेसर- जी नहीं जनाब, इससे आपकी जिज्ञासाएँ पूरी तरह शांत नहीं होगी।  अगर तुम्हें अपनी प्रत्येक जिज्ञासा शांत करनी है तो प्राचीन व आधुनिक दोनों इतिहास पढ़ना पड़ेगा।गौरव- आप तो जानते हैं कि मेरी हिन्दी पढ़ने की गति कितनी धीमी है, ऐसे में प्राचीन इतिहास की मोटी पुस्तक को खत्म करने में ही मुझे साल भर लग जाएगा, फिर मैं आधुनिक इतिहास कब पढूँगा?प्रोफेसर- मेरे अनुमान से तुम्हारी हिन्दी पढ़ने की गति इतनी भी धीमी नहीं है।गौरव-दादाजी मुझे पढ़ने का वक्त भी तो नहीं मिलेगा, विद्यालय के गृहकार्य के बाद बचे समय में तो आप मुझे जबरदस्ती खेलने के लिए भेज देते हैं।प्रोफेसर (मजाकिया लहजे में)- तो जिज्ञासाएं शांत करने के लिए साल भर इंतजार कर लो।गौरव-आप मुझे परेशान कर रहे हैं मुझे अपनी शंकाओं का समाधान तत्काल चाहिए।प्रोफेसर- अच्छा ठीक है पर इतना जान लो कि सच्चाई रोमांचक होने के साथ-साथ भयावह भी है।गौरव-भयावह?प्रोफेसर- हाँ भयावह, हमारे (मनुष्यों) द्वारा विकसित की गई तकनीक के सुप्रभाव के साथ-साथ बहुत से दुष्प्रभाव भी हुए, हमारे द्वारा बनाए गए आविष्कार हम पर ही भारी पड़ गए परिणामस्वरूप हमें युद्धों की एक श्रृंखला से जूझना पड़ा जो एक ऐसे महायुद्ध पर खत्म हुआ जो हर मोर्चे पर लड़ा जा रहा था, इन युद्धों में हमारा सारा तकनीकी ज्ञान व विकास स्वाहा हो गया।गौरव- मैं ढंग से समझा नहीं, मुझे विस्तार से समझाइए। प्रोफेसर-इसमंे मुझे समझाने की कोई जरूरत नहीं है (बुक सेल्फ की तरफ इशारा करते हुए) वो जो उपरी खाने में रखी मोटी सी लाल और सफेद कवर वाली पुस्तक देख रहे हो ना, उसमें उन सारे प्रश्नों का जवाब है जो तुम्हारे मन में कुलबुला रहे हैं, जाओ उसे ले आओ साथ में पढ़ते हैं और आज मैं तुम्हें खेलने के लिए भी जबरदस्ती नहीं करने वाला।गौरव-व्ज्ञ दादाजी, पर उसमें लिखा क्या है?प्रोफेसर- इतिहास का केवल वो भाग जो तुम्हारी समस्त जिज्ञासा कुछ क्षणों में ही शांत कर देगा।इसके बाद गौरव तुरन्त उठकर वो पुस्तक लाया, जिसका नाम था ‘‘भविष्य 3000’’। दादाजी ने वो पुस्तक हाथ में ली और पढ़ना शुरू किया।                      1श्रीकृष्ण ने कहा है ’’कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’’ अर्थात् केवल कर्म करना ही तुम्हारे अधिकार क्षेत्र मंे है, उसका फल अधिकार में नहीं इसलिए कर्म करो फल की ंिचंता मत करो। लेकिन मनुष्य अपने अहंकार और क्षुद्र सोच के कारण इसका कुछ अलग ही मतलब निकाल लेता है और भूल जाता है कि श्रीकृष्ण ने उपरोक्त वाक्य अच्छे कर्मों के लिए कहे थे न कि ऐसे कर्मों के लिए जो बुरा परिणाम दे। 31वीं सदी का मनुष्य भी बिना फल के बारे में सोचे केवल कर्म करके खुश हो रहा था।ये घटना 31वीं सदी की है। इस दौर में धर्म का पूर्णतः नाश हो चुका है, भगवान में आस्था रखने वाले केवल चंद लोग ही अस्तित्व में हैं, न ही कोई यज्ञ में रूचि दिखाता है न ही पूजा-पाठ में, सम्पूर्ण मानवजाति की सोच इतनी संकीर्ण हो गई है कि वह सिर्फ अपने ही बारे में सोचती है, नैतिकता का ढांेग भर शेष है वास्तविक नैतिकता का लोप हो चुका है।परन्तु मनुष्य ने तकनीक के मामले में काफी उन्नति की है। रोबोट एज बीत चुका है, कम्प्यूूटर एज तो उससे पहले ही बीत गया अब जमाना है ’रोबोसेपियन्स’ का। रोबोट की तकनीक और मानव का क्ण्छण्। मिलाकर बनाए गए इन ’रोबोसेपियन्स’ को हम सोचने वाली मशीनो की श्रेणी में रख सकते हैं क्योंकि ये दिखने और सोचने में तो मनुष्यों के समान हैं पर इनकी कार्य-कुशलता रोबोटों जैसी हैं यहाँ तक कि इनका विवेक मनुष्यों जैसा पर दिमाग में स्टोरेज रोबोटों जैसी है। ’रोबोसेपियन्स’ के अलावा मनुष्यों ने जानवर व मनुष्य का क्ण्छण्। आपस में मिलाकर कृत्रिम गर्भाशयों मंे उनका पालन-पोषण करके तरह-तरह के अजीबोगरीब जीव भी बनाए हैं, जिसे वर्तमान दुनिया ’म्यूटेंट’ कहती है।तकनीकी उन्नति के कारण दुनिया इतनी सिमट चुकी है कि लोग आवागमन भी शौक पूरा करने के लिए करते हैं, कम्प्यूटर पर होने वाले ज्यादातर काम घर पर ही होते हैं। लोगों के पास वायुयानों की संख्या इतनी ज्यादा हो चुकी है कि अब रोड टैªफिक की जगह एयर टैªफिक चिंता का विषय है, हवा से पानी बनाने वाली मशीनों के कारण भौमजल का उपयोग खत्म हो चुका है। खाने-पीने की हर चीज होम डिलिवरी के माध्यम से पहुँच जाती है, खेती प्रयोगशालाओं में सिमट कर रह गई है क्यांेकि वहीं पर इतनी मात्रा में अन्न उत्पादित हो जाता है कि कहीं और कृषि की आवश्यकता ही नहीं, जानवर अब केवल चिड़ियाघरों में दिखते हैं, हर घर में नौकर के तौर पर एक रोबोट या रोबोसेपियंस कार्यरत है, सुपरसोनिक बुलेट टेªन्स के कारण अन्य सभी प्रकार की टेªनों ने अपना अस्तित्व खो दिया है। कभी न खत्म होने वाली सड़को पर अब सिर्फ वाहन ही दिखते हैं। प्रदूषण इतना बढ़ चुका है कि ‘मास्क‘ जीवन की मूलभूत आवश्यकता है। विद्यालय नाम की संस्था खत्म हो चुकी है, अब सीधा घर-घर के कम्प्यूटरों पर आनलाईन शिक्षा दी जाती है। हैकिंग इतनी आम बात हो गयी है कि लोगों को अपने कम्प्यूटर में एंटी वायरस के साथ-साथ एंटी-हैकिंग साफ्टवेयर भी इंस्टाल करना पड़ता है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि मशीनों के कारण मनुष्यों का आपसी जुड़ाव पूर्णतः खत्म होने के कागार पर है।तकनीकी उन्नति की श्रृंखला में डाॅ0 काॅपर व उनकी टीम ने भी झण्डे गाड़ दिए हैं, डाॅ0 काॅपर ॅवतसक त्वइवज त्मेमंतबी ब्मदजमत ;ॅत्त्ब्द्ध न्यूयार्क में वरिष्ठ वैज्ञानिक हैं जो यूनाइटेड नेशनल आर्गनाईजेशन (न्छव्) द्वारा चलाई जाती है। डाॅ कापरनिकस ने दशकों की मेहनत के बाद एक ऐसा जीव बनाया है जिसे किसी श्रेणी में रखना नामुमकिन है। यह 10 जीवों का क्ण्छण्। और रोबोटिक तकनीक को मिलाकर बनाया गया एक अद्भुत जीव है जो अपने अंदर के दसों जीवों की क्षमताएं धारण करता है।इस जीव में मिलाया गया घोड़े का क्ण्छण्। इसे हजार घोड़ों की ताकत देता है और हमेशा मेहनत करने को तत्पर करता है। हाथी का क्ण्छण्। इसे हजार हाथियों जितना बाहुबल प्रदान करता है। वानर का अंश इसे कहीं पर भी संतुलन बनाए रखने की क्षमता देता है तो वही गिद्ध का क्ण्छण्। इसे अपार बल, पैनी नजर और उड़ने की शक्ति देकर आकाश का सम्राट बनने का सामथ्र्य प्रदान करता है। चमगादड़ के क्ण्छण्। के कारण यह रात के अंधेरे मंे भी कार्य करने और बिना कानों के भी सुनने में सक्षम है। चीते की रफ्तार व शिकार के दौरान सही निर्णय लेने की क्षमता से प्रभावित होकर आविष्कारक दल ने इस जीव में चीते का भी क्ण्छण्। मिलाया है। सर्प का क्ण्छण्। इस जीव को सर्प की भांति बल, खाल छोड़ने की क्षमता और सबसे महत्वपूर्ण गुण ’लचीलापन’ प्रदान करता है। कई विद्वानों के मन में संदेह के बावजूद डाॅ0 कापर ने इस जीव में गिरगिट का क्ण्छण्। मिला दिया, जिस कारण यह जीव कहीं भी, कभी भी किसी भी जीव का रूप धारण करने में सक्षम हो गया है और इस योग्यता के कारण इसे कहीं बंधक बनाकर रख पाना लगभग असंभव है।पौधे का  क्ण्छण्। ऊर्जा की दृष्टि से मिलाया गया है। इसमें एक ऐसे हाइब्रिड पौधे का क्ण्छण्। मिलाया गया है जो मात्र एक घण्टे सूर्य का प्रकाश पाकर ही हजार दिनों तक की ऊर्जा बना डालता है अर्थात केवल एक घण्टे धूप संेककर भी यह जीव हजार दिन तक जीवित रह सकता है। जिस दसवें जीव का अंश इसमें मिलाया गया है वहीं इसे जानवरों से अलग बनाता है और उच्च कोटि का विवेक प्रदान करता है। वह क्ण्छण्। है मनुष्य का। डाॅ0 काॅपर ने मनुष्य के क्ण्छण्। के तौर पर इसमें अपना क्ण्छण्। मिलाया है ताकि यह उन्हीं की तरह बुद्धिमान और विवेकी हो।इतना ही नहीं इस जीव में ऐसी तकनीक का प्रयोग हुआ है कि यह अपने अन्दर मौजूद जीव में से किसी भी जीव की अनगिनत प्रतियाँ (ग्मतवग) बना सकता है। इसे मनुष्य रूप में रहने के लिए प्रोग्राम किया गया है पर जरूरत पड़ने पर यह दसों सिरों व उन जीवों की भुजाओं को एक साथ धारण कर सकता है। अगर इस जीव को तोप का गोला भी लग जाए तो इसके घावों को भरने के लिए इसके अंदर के माइक्रो रिपेयरिंग सेल्स तुरन्त एक्टिव होकर सेकेण्डों में घाव भर देंगे।डाॅ0 कापर व उनकी टीम ने जितनी मेहनत इस जीव के अंदर डाले गए क्ण्छण्। पर की है उतनी ही मेहनत इसे तकनीक से लैस करने पर भी की है। कहने को तो इसका सिर मानव का है पर उसकी आंखों में माइक्रोकैमरे लगे हैं, जिस कारण अगर यह निशाना भी लगाएगा तो वह अचूक होगा। इसके हाथों में माइक्रोगन तथा कंधो में माइक्रोब्लास्टर्स लगे हैं जिससे निकली बुलेट किसी तोप के गोले जितनी तबाही मचाने में समर्थ हैं। इसकी बुलेट्स और मिसाइल  में लगे सेंसर अपने आप ही निशाना ढूंढ लेते हैं और लक्ष्य को भेदकर ही दम लेते हैं। इसकी गन एक सेकेण्ड में सैकड़ों को मौत की नींद सुला सकती है। इसे बेहद पुराने जमाने के योद्धा की तरह धनुष भी दिया गया है पर इसका धनुष कोई साधारण धनुष न होकर प्रौद्योगिकी से लैस है, यह केवल अपने मालिक के फिंगरप्रिंट से ही एक्टिव होगा और इसमें से निकला एक तीर एक साथ कई निशाने भेदेगा। इन सब के अलावा भी बहुत से ऐसे अस्त्र-शस्त्र इसके तरकस में पड़े हैं जिनकी कल्पना ही की जा सकती है। यहाँ तक की इसका तरकस भी आटोमैटिक ’एडजस्टेबल’ और आवश्यकतानुसार अदृश्य होने में सक्षम है।आविष्कारक दल ने इसकी सेफ्टी का भी भरपूर ख्याल रखा है। इसके कपड़े बुलेटप्रूफ है, इसकी ढाल और कवच 32 धातुओं को मिलाकर बनाई गई एक मिश्रधातु ’स्टेंªथ’ से बने हंै जिसे दुनिया का कोई हथियार भेद नहीं सकता, इसके गर्दन पर भी स्टैªंथ की परत चढ़ाई गई है ताकि कोई इसका सर धड़ से अलग न कर सके। दुनिया की सारी फाइटिंग स्किल जैसे कि कंुग फू, कराटे, मार्शलआर्ट, ताइक्वांडेेो, कुश्ती, मुक्केबाजी इत्यादि पहले से ही इसके मस्तिष्क में लगी चिप में अपलोडेड हैै जिस कारण पास में सुरक्षा व प्रहार का कोई साधन न हाने पर भी यह शक्तिशाली से शक्तिशाली शत्रु के प्रहारों से बच सकता है और उसे धूल चटा सकता है।इस बात का भी पूरा ख्याल रखा गया है कि इस जीव के अंदर के मनुष्य पर कहीं दूसरे जीव हावी न हो जाएं या यह जीव स्वयं अनियंत्रित न हो जाए। इसलिए इसके मस्तिष्क मंे एक माइक्रोचिप लगाई गई है जिसे केवल ॅत्त्ब् के  मुख्य हेडक्वार्टर से ही कंट्रोल किया जा सकता है। यह चिप ऊर्जा व ज्ञान का मुख्य स्रोत है तथा ॅत्त्ब् द्वारा निर्मित इस जीव को नियंत्रित करने का साधन है। सुरक्षा की दृष्टि से ॅत्त्ब् के मुख्य हेडक्वार्टर जहाँ से इस जीव को कंट्रोल किया जाना है, मे केवल डाॅ0 कापरनिकस व प्रो0 पारा ही जा सकते हंै और वो भी एक साथ क्योंकि वह कमरा दोनों के एक साथ दिए गए फिंगरप्रिंट और रेटिना स्कैन से ही खुलता है, इस रूम की सारी सुविधाएं दोनों के बाॅडी टेम्परेचर पर ही चालू रहती हैं, थोड़ा भी परिवर्तन होने पर मशीने तुरन्त स्कैनिंग द्वारा क्ण्छण्। जांच लेती हैं और सेकेण्डों में कमरा बंद हो जाता है। अर्थात् डाॅ0 कापर और प्रो0 पारा को छोड़कर वहाँ एक चूहा भी नहीं जा सकता।डाॅ0 कापर ने इसी कमरे में बैठकर अपने अरमानों के जीव के निर्माण व विकास की योजना बनाई पर विनाश की योजना न बना सके, उन्होंने अपने आविष्कार को डिएक्टिवेट या नष्ट करने का कोई स्थाई बंदोबस्त नहीं किया केवल प्रोग्रामिंग में फेर-बदल करके नियंत्रण स्थापित करने के बारें में ही सोच पाए। दरअसल आविष्कार की क्षमता को उन्नत व अतिविकसित बनाने के लिए उसके शरीर में मौजूद हर कोशिका को इस तरह बनाया गया था कि वह कभी काम करना बंद ही नहीं करती ऐसे में आविष्कार मरता कैसे, उसका हर अंग खुद को ठीक या पुर्ननिर्मित करके सदा सक्रिय रहने के लिए बना था। अर्थात इसके विनाश का उपाय वर्तमान में किसी के पास नहीं था, शायद यही डाॅ0 कापर की सबसे बड़ी भूल थी क्योंकि संसार में जो भी आता है उसे जाना ही पड़ता है।इतने बड़े आविष्कार के बाद डाॅ0 कापर ने एक प्रेस कान्फ्रेंस बुलवाई-प्रेस – सर, आपने इतनी मेहनत से एक ऐसा जीव बनाया है जिसे किसी भी जीव की श्रेणी में रख पाना मुश्किल है, इसका नाम क्या रखा है?डाॅक्टर- ’काल’।प्रेस – सर आपको नहीं लगता ये ’डरावना’ नाम है।डाॅ. – आपका प्रश्न सौ फीसदी सही है, असल में ’काल’ को अपराधियों के विनाश के लिए बनाया गया है, ये उनके लिए काल है, अंत है, इसलिए इसका नाम भी ’काल’ है।प्रेस – सर आज हमारे पास अपराध रोकने के लिए उन्नत से उन्नत तकनीक है फिर आपने काल को क्यों बनाया?डाॅ.- अगर हमारे पास उन्नत तकनीक है तो अपराधियों के पास भी कम उन्नत तकनीक नहीं है, हम साइबर क्राइम को एक जगह बैठकर रोकने की कोशिश कर सकते है लेकिन रात के सन्नाटों में हो रही चोरियों, डकैतियों व हत्याओं के सामने हम कहीं न कहीं विवश हैं। अपराधियों का सामना करते समय जब हमारे आॅफीसर्स मारे जाते हैं तो आप ही लोग पूछते हैं कि सर आप कोई ऐसी तकनीक क्यों नहीं आजमाते जिसमें हमारे आफीसर न मारे जाएं।प्रेस – सर अगर आॅफीसर्स की जान ही बचानी थी तो आप रोबोकाॅप या रोबोसेपियंस का इस्तेमाल कर सकते थे। काल जैसे जीव की क्या जरूरत थी?डाॅ0-    बेशक रोबोकाॅप अपराधियों को पकड़ने में निपुण है परन्तु अगर रोबोकाॅप से कनेक्सन टूट जाए तो वह बेकार है और अगर नियंत्रण चला जाए तो आत्मघाती भी। रोबोसेपियन्स की बुद्धि विवेक कमाल की है और इसके अंदर हम कई क्षमताएं भी विकसित कर सकते हैं पर हमें किसी ऐसे की तलाश थी जो जरूरत पड़ने पर उड़ सके, दौड़ सके, अपराधियों को बिना चोट पहुंचाए पकड़ सके और मशीने खराब हो जाने पर भी अपने बाहुबल और विवेक का प्रयोग करके हर मुसीबत से उबर सके।प्रेस – क्या गारण्टी की काल का विवेक सही काम करेगा?डाॅ.- जब विज्ञान और विवेक मिल जाए तो विवेक सही दिशा ही दिखाता है। फिर काल को क्या करना है ये तो हम लोग ही तय करेंगे।प्रेस – और अगर काल आपके नियंत्रण से बाहर होकर भारी तबाही मचाने लगे तो।डाॅ.- यह अनियंत्रित नहीं हो सकता, ये जिस सिस्टम से कंट्रोल किया जाता है वह पूर्णत ॅत्त्ब् के नियंत्रण में है और बिना सिस्टम में छेड़छाड़ के ये अनियंत्रित नहीं हो सकता।प्रेस –  लेकिन अगर आप की नीयत बिगड़ी तब तो आप इसे नियंत्रित करके स्वार्थ सिद्ध कर सकते हैं?डाॅ.- सिस्टम सिर्फ मेरे नियंत्रण में नहीं है, प्रो0 पारा और मेरे संयुक्त नियंत्रण में है, प्रो0 पारा मुझे गलत कदम उठाने से रोक सकते हैं और ॅत्त्ब् चाहे तो मुझे हेडक्वार्टर मंे घुसने ही नहीं देगा और जिसने आज तक कितने ही घातक आविष्कार किए, रोबोसेपियंस, रोबोकाॅप और म्यूटेंट बनाए पर कभी उनका दुरूपयोग नहीं किया उस पर आप इतना अविश्वास कैसे कर सकते हैं।प्रेस – साॅरी सर लेकिन एक सवाल और।डाॅ.- पूछिए।प्रेस – सुना है ’काल’ को नष्ट नहीं किया जा सकता क्या ये सही है?डाॅ.- हाँ येे सही है पर ये एक कान्फिडेन्सियल मैटर है इसलिए मैं इसके बारे में और कुुछ नहीं बता सकता और फिलहाल मुझे अपने सहयोगियों के संग एक आवश्यक बैठक में जाना है, अपने अनन्त प्रश्नों का पिटारा फिर कभी खोलिएगा।इतना कहकर डाॅ0 काॅपर जाने लगे प्रेस ने पूछना भी चाहा कि जरूरत पड़ने पर काल को डिएक्टिवेट कैसे करेंगे पर यह प्रश्न डाॅक्टर कापर के कानों तक नहीं पहुँचा।

8 reviews for भविष्य 3000

  1. Rated 5 out of 5

    Navneet

    भविष्य 3000 उपन्यासों की श्रेणी में एक अलग तरह का उपन्यास है,Full paisa vasool novel…

  2. Rated 5 out of 5

    Pankaj

    fantabulous

  3. Rated 5 out of 5

    Saurabh (verified owner)

    Synopsis jabarjast hai

  4. Rated 5 out of 5

    Himanshu

    wow amazing novel…dosto agar ise nii padha to aapne bhut kuch miss kr diya…

  5. Rated 5 out of 5

    prakash mani maurya

    wow amazing……. must read friends

  6. Rated 5 out of 5

    Alok Kumar Rai

    Awesome piece of work. Brilliant work in Hindi lit. that too on such plot gives thrills. A must read one

  7. Rated 5 out of 5

    Ranveer singh

    Amazing . It is new in it’s own type . Everything is new . Good concept. If u don’t read this, u miss a fantastic world

  8. Rated 5 out of 5

    Abhijeet Tripathi

    Wonderful novel

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